--सस्ता साहित्य मण्डल का छुठा मंथ--

भारत के खी-रल

. वेदिक काल : पहला भाग

इन जा खत का

रामचन्द्र वर्मा : शंकरलाल वर्मा

प्रकाशक सस्ता साहित्य मएडल, दिल्ली

पाँचवीं बार १५५० जनवरी सन १६३७ मूल्य एक रुपया

पिता जम अजीज मे मिल आज आज भी मे जे जे |

“सस्ता-साहित्य-मण्डल ने हिन्दी मे उच्चकोटि की सस्ती पुस्तक निकालकर हिन्दी की बड़ी सेवा की है। सर्वेसाधारण को इस ससस्‍्था की पुस्तके छेकर इसकी सहायता करनी चाहिए ॥”

मदनमोहन मालवीय

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मुद्रक हिन्दुस्तान टाइस्स प्रेस, - दही

विषय-सूची

विषय के सती कप ९३४ इ्‌ २--पार्वतती हि 5१४ अब ३० ३--सावित्री है शा ४--सरस्वती ०० ००० श्र ५-लथ्ष्मी गन ६१ ६--अदिति हि ««.... देश ७--बाक्‌ 20 मा ६४ ८--रोमशा हे बडे ६७ ९--विश्ववारा 228 3३६ द्ष्प १०--अपाद्ध_ «०० ००० ७० ११--धोषा मा ७२ १२--शश्वती *«० ४३८ ष्८ १३--सूर्या ब्रह्मगादिनी .. ... ५.० ८० १४--जुहू ब्रह्मबादिनी शक ८३ १४--दक्षिणा ब्रह्मदादिनी .... शव ८५ १६--तपती 2 प्‌ १७--कांत्यायनी कर का 8६ १८--श्रुवावती ६७ १६--कैतको हर १०० २०--शतरूपा बडे मत १०६

२१--रति 2 की श्ण्८

२७--देवहूती २८-गार्गी २६--मैत्रेयी - * ३०--सुशोभना ३१--झुकन्या ३२--शांडिली - ३३-प्रमद्रा ३४--ज रत्कारू ३४-शर्मिष्ठा

३६--झुनीति ओर सुरुचि

३७--शन्या ३८--सावित्री ३६--दमयन्ती ४०-- शकुन्तला ४२--छुलभा

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११३ श्श्८ श्र्द्द १२६ १३६ १४३ १४५ १५३ १६० १६३ १७७ १८० १८४ १६० श्ध्८ २२६ २४० २६३६: . र८७ ३२७

निवेदन

भारत के स्त्री-रत्न' के तीन भाग अबतक हम प्रकाशित कर चुके हैं। ओर यह इतनी छोक-प्रिय हुई कि अब इसके पहले भाग का पाँचवां संस्करण हम पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। इस बार इसे परिवद्धित ओर संशोधित कर दिया गया है। नये सिरे से इसका सम्पादन हुआ है ओर चरित्रों को काछ-क्रमानुसार बाँट दिया गया है जिसके अनुसार इस पहले भाग में वैदिक काल के स्त्री रत्नों का परिचय है; ओर दूसरे में रामायण--महाभारत- काल के चरित्र रहेंगे जैन ओर बोद्ध काल के चरित्रों का तीसरा भाग निकल ही चुका है। बाद के भाग तैयार हो रहे हैं। आशा है पाठक इस संस्करण को पसंद करेंगे ओर पहले की ही तरह आगे के भागों का स्वागत करेंगे

प्रकाशक

उपोह्चात

भारतीय सभ्यता का प्राचीनतम समय वैदिकयुग है। थयेदि: हम: इस यृग को संसार की सभ्यता का श्रेष्ठतम युग भी कहे, तो अत्युक्ति होगी इस समय पृथ्वी में अनेक सुधरी हुई जातियाँ है, जिनका अनु- करण करने में हम अपना गोरव समझते हे परन्तु उस काल में तो इन अनेको जातियों का कही पता भी था, तथापि हमारे पूर्वे-पुरुषो ने उस प्राचीन समय में भी जीवन के उच्च आदरशों तथा परमात्मा और समाज- विषयक कई महान्‌-महान्‌ कल्पनाओं और भावनाओ को जन्म दिया था

इस वेदिकयृगीन समाज मे स्त्रियो का स्थान बहुत ऊँचा था। वे स्वतंत्र थी, उनकी शिक्षा आदि का भी अच्छा प्रबन्ध था, उन्नति के लिए ज्ञान और धर्म मे विकास करने का पूरा मोका मिलता था स्त्रियाँ पुरुषों की क्रीड़ा और भोग की सामग्री नही समझी जाती थी समाज की सब तरह से उन्नति करने में हाथ बटाने का उन्हे अधिकार था। यजमान- पत्नी के बिना यज्ञ-कार्ये अधूरा समझा जाता था। वेदिक-संस्कार और शिक्षा प्राप्त करने का भी उन्हे सपूर्ण अधिकार था। यम और हारीत के ग्रन्थो से पता चलता है कि प्राचीनकाल मे कुमारिकाओ का भी उपनयन- संस्कार होता था यज्ञोपवीत धारण करके वे वेदाध्ययत और अग्निहोत्र की अधिकारिणी बन जाती थी इस युग मे ब्रह्मवादिनी स्त्रियो की भी कोई कमी नही थी घोषा, सुर्या, विश्ववारा, लोपामुद्रा, इन्द्राणी आदि मन्त्रद्ष्ट्री देवियाँ इसी काल में हुई थी, जिनके चरित्र भी इस चरित्र- माला में दिये हे इनके द्वारा जो सृकत रचे गये उनके भाव बड़े ही ऊँचे हे वेदिक सूक्‍तो के अर्थे के विषय में बहुत भारी मत-भेद है हमने इन मन्‍्त्र-द्रष्ट्रियो के सृकतों का अर्थ एक आयंसमाजी विद्वान के मतानुसार दिया हैं | विवाहादि संस्कार-प्रसंगों पर आज भी भक्तिपूर्वक

( )

इन सूकतों का पाठ किया जाता है। स्त्री-जीवन के किस आदरों को इन कोमल-हृदया आययँ-महिलाओ ने प्राप्त किया था, यह तो उनके चरित्र ही से ज्ञात होगा

आचार्य श्री आनन्दशकर बापूभाई ध्यूव के शब्दों मे कहना चाहे तो, “ऋषियो की परमात्मा-सम्बन्धी प्राचीनतम भावना पुरुष-रूप में नही सत्री-रूप में ही प्रकट हुई थी

अदिति' शब्द से ही आदित्य' शब्द बना है। इस अदिति की कल्पना किसी देवता की स्त्री के रूप मे नही की गई है इसे तो स्वतन्त्र आदि-कारण-देवताओ की माता माना गया है फिर स्त्री की मूर्ति उन्हे कितनी मनोहर मालूम होती थी, यह तो उषा के असरूय वर्णनो में कहे गये प्रत्येक शब्द से ज्ञात होता है स्त्री और पुरुष यज्ञों में एकसाथ भाग लेते, स्त्री और पुरुष दोनो मिलकर घर के मालिक (दम्पतीः-दम - घर+पति---मालिक) समझे जाते थे। और गृहमित्याहुगृहिणी गृह- मुच्यत्े--ईंट-मिट्टी का मकान गृह नही, गृहिणी गृह है। यह वचन चहुत आधुनिक लगता है,परन्तु इस बात के कई प्रत्यक्ष प्रमाण पाये गये है कि यह कोमल भाव वेदिक काल में भी था। मण्डल ३४-५३ में ऋषि जयेद्मस्तं मघवन्‌ सेदुयोनि+--हे मघवन्‌ (इन्द्र) ! स्त्री ही घर है, वही सवकी मूलभूता हँ-- इस प्रकार स्त्री का महत्व बताकर इन्द्र से प्रार्थना करते हे कि वह गृहस्थाश्रमी के यहाँ आवबे ।”

वेदिक कार में एकसाथ अनेक स्त्रियाँ रखने का रिवाज था या नही, इस विपय पर विचार करते हुए विद्वान्‌ आचायें ध्यूब कहते हैं---“बहुवा राजा अनेक स्त्रियों से विवाह करते होगे, परन्तु जन- समाज में तो सामान्यत एक ही पत्नी रखने का रिवाज रहा होगा (जैसे वशिप्ठ की अरुन्धतती) क्योकि दसवे मण्डल में छम्न-सम्बन्धी जो

(हे.

सूत्र आया हैं उसमें पति-पत्नी के तत्कालीन सम्बन्ध के विषय में विचार पाये जाते हे वध्‌ को उसमे निम्नलिखित आशीर्वाद दिया गया है-- सम्राज्ञी्रशुरेभव सम्राज्ञीश्रश्रवाँ भव | ननान्दरि सम्राज्ञी भव॒सम्राश्याधिदेजृषु ॥।

“इवसुर पर तू महारानी-पद को प्राप्त कर, सास पर सम्नाज्ञी-पद प्राप्त कर, इसी प्रकर ननद और देवर पर भी सम्राज्ञी-पद को प्राप्त करले ।'

“इसमे सपत्नी (सौत) का उल्लेख नही है। यदि उस समय एक- साथ अनेक स्त्रियों से शादी करने की प्रथा होती, तो हम यह आशीर्वाद सबसे पहले पढ़ते कि तू सपत्नियो पर सम्राज्ञी-पद प्राप्त कर इसी सूक्‍त में इस बात के समझने के लिए भी बहुत से वचन है कि उस समय पति- पत्नी के स्नेह की भावना कितनी ऊँची रही होगी वर-वधू देवताओं से प्राथंना करते हे कि वे उनके हृदयो को एक-दूसरे के साथ जोड़ दे--- मिला दे पाणि-ग्रहण के समय वर कहता है, 'सौभाग्य के लिए में तेरा हाथ पकड़ता हूँ मेरे साथ तू वृद्धा हो। भग, सविता, पुरंध्यि और अयेमा इन देवताओ ने गृहस्थाश्रम भोगने के लिए तुझको मेरे अरपेण किया है ।”

“पति-पत्नी साथ-साथ वृद्ध हो, इससे बढ़कर सुख संसार में नही है यह पवित्र भाव आये ऋषियो को बड़ा प्रिय रूगता था इसी सुक्त में वर फिर कहर्ता है, 'हे अयेमा, हमे ठेठ वृद्धावस्था के अन्त तक के लिए एकसाथ जोड़ दो ।' किसी दूसरे सुक्‍त में कहा है, 'इस घर में अपने प्यारे पति को प्रजा देकर सुखी कर। इस घर में अपने गृहपत्नीपन का उपभोग करने के लिए जगती रह। इस पति के साथ अपना शरीर जोड़ दे और ठेठ वृद्धावस्था तक तुम एकसाथ ही परमात्मा की ज्ञानभरी प्रार्थना करो ।*

“अच्छे दिलवाली, अच्छे शरीरवाली, वीर माता, देवकामा अर्थात्‌ धामिक वृत्तिवाली, सर्वत्र शान्तिदायक आँखोंवाली और घर के सभी

अर,

मनुष्य और पशुओं के लिए कल्याणकारी स्त्री की चाह ऋषि हमेशा किया करते हैँ। पत्नी का सम्बन्ध केवल इस लोक के लिए ही नही, परलोक में भी पति के साथ पत्नी का वास कहां गया है शुक्ल यजुर्वेद- सहिता में भी सर्वोपरि चूलोक में पत्नी-सहित जाने की इच्छा प्रकट की गई हैं अथवंवेद में पत्नी को उपदेश विया गया है कि पत्ति के साथ धर्माचरण करके वह अमृतत्त्व के लिए तैयार रहे

४.८ » ऋग्वेद-सहिता के समय की एक उच्च भावना को अथवं- वेद-सहिता के समय अधमता को पहुँची हुई देखकर हमे बडा शोक होता है | अथवंबेद में आते-आते हम सपत्नी के दुख को इतना बढा हुआ देखते है कि स्त्रियों की तरफ से हमारे कानो पर यह प्रार्थना आती हैँ, मेरी सपत्नी को पीछे हटा; मेरे पति को मुझ अकेली का ही पति बना दे ।!

“हून-सुक्‍्त मे सास-ससुर और नवद-देवर पर साम्राज्य प्राप्त करने के मन्न के साथ यह भी जोड दिया गया है कि सिन्ध नदी के समान पति के घर जाकर साम्राज्य-पद प्राप्त कर | साथ ही पत्ति को वश में करने के लिए तथा सपत्नी को निकालने के लिए जडी-बूटी खोदने का एक मलिन मन्न भी अथर्ववेद में पाया जाता है | इससे प्रतीत होता है कि मूल में जो परिवर्तेन हुआ वह अनायों की सगति का परिणाम होगा, अथवा अभी वह शायद केवल नीचे के वर्ग के लोगो के लिए ही होगा

“ब्राह्मप---आरण्यक और उपनिषद्‌ भ्रन्थो के काल मे पाया जाता है कि स्त्री की प्रतिष्ठा तत्त्वज्ञान की सहायता से प्रतिपादित की गई है।

“हम देखते हे कि ऋग्वेद के समय में स्त्रियों ने मनत्नो की रचना की हैँ उपनिषत्काल में मैत्रेयी, गार्गी जैसी सुप्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी स्त्रियाँ हो गईं और इसके वाद के काल में--यदि भागवत. का प्रमाण लेकर चलें तो--हम देखते हे कि वपुना और धारिणी नामक दो अविवाहित स्त्रियाँ

( ५) ब्रह्मवादिनी हो गई है सबसे विशेष जाननेयोग्य बात तो यह है कि इस काल में यह सिद्धान्त स्पष्ट रूप से प्रतिष्ठित हो गया था कि सुयोग्य माता के बिना ब्रह्मविद्‌ होना असम्भव है “)( स्वयं शंकराचार्य ने कहा है कि जिस पुत्र को अनुशासन- शिक्षा आदि देनेवाली माता हो वही मातृवान है

“८ 2८ उपनिषद्‌ के समय से देश में वैराग्य की भावना फलने लग गई इसलिए यह स्वाभाविक है कि याज्ञवल्क्य जेसे विरागी तत्त्ववेत्ता को ससार-निरता कात्यायनी की अपेक्षा अमृतत्त्व की इच्छा करनेवाली मैत्रेयी अधिक प्रिय थी धीरे-धीरे यह कल्पना रूढ़ होने लगी कि स्‍त्री स्वभावतः ही ससार में विशेष आसकत रहती है इसलिए कात्यायनी को स्त्री-प्रज्ञा अर्थात्‌ स्त्री-बुद्धिवाली कहा गया मालूम होता है कि पुत्र के अभाव तथा एसे ही अन्य कारणो से एकाधिक पत्नी करने का रिवाज पहले की अपेक्षा अब अधिक जोर-शोर से प्रचलित हो चला था| पर इस बात में अपने पूर्वजों की कड़ी टीका करने के पहले हमे दो बाते विशेष रूप से ध्यान मे रखनी चाहिएँ। एक तो यह कि समस्त आयये-जाति की प्रजा में स्वभावत: और परिस्थिति के कारण भी पुत्र के लिए बड़ी उत्कट अभिलाषा रहती थी और दूसरे यह कि अन्य देशों की जातियों के समान तलाक देकर अनिष्ट पत्नी के भरण-पोषण की चिन्ता से सिर चुराने तथा नाम-मात्र के एकपत्नी-बन्रत की अपेक्षा वे अनेक पत्नियो को एकसाथ रखना अधिक बुरा और अप्रामाणिक व्यवहार नही समझते थे तीसरे, प्राचीन काल में हमारे देश में वेश्याये नही थी इसलिए यदि किसी पुरुष को एक से अधिक स्त्रियो से शादी करने की आवश्यकता प्रतीत होती तो वे उसे बुरा नही मानते थे। पर यह खुलासा इसलिए नही दिया जा रहा है कि हम बहु-पत्नी वाली प्रथा की प्रशसा या बचाव

( )

करना चाहते है हम तो केवल यही बताना चाहते है कि कुछ कारणो से वह कुप्रथा भी क्षन्तव्य हो गई थी

“बेदाग के समय में आने पर हमे यास्क का तिरुकत एक मुख्य ग्रन्थ दिखाई देता हैं ) इसमे देवर का अर्थ बताते हुए लिखा है कि स्त्री देवर के साथ बाजी खेलती है ( दीव्यते ) इसलिए उसे देवर कहा जाता है इसपर से कुदुम्ब मे देवर-भौजाई आपस में किस तरह रहते थे, इसका हमे खयाल हो सकता है दूसरे, इसमें एक स्थान पर इस प्रशरन की भी चर्चा की है कि पुत्र और पुत्री दोनो अपने पिता के एकसे वारिस हो सकते हे या नही | एक जगह यह भी लिखा है कि दोनो अपने माता- पिता के शरीर से उत्पन्न होते हे इसलिए दोनो उनके एकसे उत्तरा- धिकारी हैँ अन्त मे यह तय किया कि जिस लड़की के भाई हो उसे दाय का अधिकार है यह वात तो स्वभावत जाननेयोग्य हैं कि दोनो का अधिकार समान हो परन्तु लडकी को वारिस बनाने के लिए यास्क ने जो कारण पेश किया है उसे जानकर दु होता है * “लडकी को फेक देते है, लड़के को नही; स्त्रियों का दान, व्यापार किया जाता है, पुरषो का नही ।” सचमुच यह स्थिति दु खद है जैसा कि टीकाकार कहता हैं, यदि यह दान, बिक्री या त्याग भिन्न-भिन्न प्रकार के विवाह हो तो वह इतने दु का कारण नही है पर मुझे भय है कि आजकल स्त्रियों की जो अवमानना होती हैं उसका आधार कही यही वाक्य हो ! फिर दुहिता शब्द का निर्वाचन करते हुए यास्क कहता है कि साझे में रक्खी हुईं, दूर देश अथवा परायें घर की शादी की हुईं, अथवा. दोग्चेः अर्थात्‌ मात्ता-पिता के पैसे दुहनेवाली, या जैसा कि ओरियेंटल स्काछर कहते हे गायो का दूध दुहनेवाली ये दो व्युत्पत्तियाँ तो ठीक है; किन्तु दुह्टविंता अर्थात्‌ वुरी आई हुई, जिसका आता दु ख-रूप है,

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और दुरेहिता (दूसरे के घर ही भली) का अर्थ तो दुःखद ही है हाँ, यदि ससुराल में लड़की के दुःखो को देखकर माता-पिता के मुंह से दया के कारण ये वचन निकलते हों तो हमे माता-पिता पर रोष होगा परन्तु ससुराल के लोगों पर तो फिर भी जरूर रोष होगा ।'

, यास्क का समय वेद के समय से कितना भिन्न था, इसका ठीक- ठीक अनुमान इसीपर से हो सकता है कि ऋग्वेद-संहिता की कितनी ही ऋचाओ में लडकी के दायित्व की चर्चा की गई हैं। परन्तु इसमे लड़की को वारिस बनाने के लिए यह कारण पेश नही किया है कि लड़की लड़के से किसी प्रकार कम महत्व रखती है बल्कि उसने तो यह कहा हैं कि गर्भ मे आते ही लड़की दामाद का धन हो जाती है यदि उसके माँ के लड़का होते हुए भी वह अपनी छड़की को ही सम्पत्ति का उत्तरा- घिकारी बनावे तो यह परिस्थिति खड़ी हो जायगी कि वंश का कल्याण तो करे लड़का और सम्पत्ति का उपभोग करे लड़की, जो अनुचित है |

/धाभिक बातों में भी यास्क का समय असन्तोषजनक था। वेद के अर्थ से धामिक तेज चला गया था अत. यदि ससार की आविदेवता स्‍त्री के विषय में भी निक्ृषष्ट विचार उत्पन्न हो गये हों तो इसमें आइचर्य की क्या बात ? इस समय की धमं-हीनता से देश का निस्तार दो प्रकार से हुआ एक तो बुद्ध और महावीर द्वारा जगाई हुई वैराग्य की नवज्योति, और दूसरे भगवान्‌ क्ृष्ण-प्रवर्तित कमें-ज्ञान और भक्ति की अद्भुत एकता वाले उपदेश |”

(नारी-प्रतिष्ठा : वसन्‍्त, पु० अक १) रामायण के समय में स्त्रियो की जो दा थी उसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध महाराष्ट्रीय विद्वानू रा० ब० चिन्तामणि विनायक वैद्य अपने मराठी ग्रन्थ मे लिखते हे, “स्त्रियो के कत्तेव्य की कल्पना भी उस समय

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बड़ी ऊँची थी। आयें स्त्रियों के मानी थे सुशीला स्त्रियाँ। वे अपने पति को ही अपना देवता, गुरु और सर्वेस्व समझती थी। पति के साथ वे खुशी- खुशी जगलो में जाती यह मानती कि पति के सहवास में जो सुख प्राप्त होता हैँ वह स्वर्ग में भी नही मिल सकता, उसके बिना राज्य-वैभव भी नरक के समान हैं पति की सेवा करने में उन्हे अत्यन्त आनन्द होता था राजइवर्य में नौकरो की क्या कमी ? पर फिर भी जब रामचन्द्रजी बेठते तो सीताजी खड़ी रहकर उनपर पखा झलती ।” इस भावना और बर्ताव वाली स्त्रियाँ कितनी तेजस्वी होगी, इसकी कल्पना हम आसानी से कर सकते है अत. यदि हम यो कहे तो अत्युक्ति होगी कि ऐसी स्त्रियों के आस-पास सद्‌गुणो का एक अभेद्य कवच ही बना रहता था लोगो में यह मान्यता थी कि ऐसी पतिन्नता स्त्रियों का अपमान करने से हमपर भयकर ईश्वरी कोप होगा पतित्नता के अश्रु ज़मीन पर व्यर्थ नही पड़ेंगे मतलकूब यह कि उस ज़माने की स्त्रियाँ अपने पातित्नत सद्गुण के कारण अपनी जाति, स्वामी गौर समाज के लिए भूषण- रूप थी अन्य वातो में भी उस समय की स्त्रियों की--खासकर ब्राह्मण और क्षत्रिय स्त्रियो की--योग्यता बहुत ऊंची थी। वेघर पर रहकर वेदाध्ययन कर सकती थी सध्यावन्दन, होम वगरा वैदिक क्रियाये करने का अधिकार उन्हे प्राप्त था क्षत्रिय स्त्रियाँ क्षत्राणियो के योग्य विद्यायें सीखती यह पढकर किसे आइचय नही होगा कि कंकेयी ने रण-सम्राम में कैसे समय पर दशरथ के सारथी का काम किया था ?

यद्यपि स्त्रियाँ बहुधा वाहर जाती-आती नही थी, तथापि उत्सव अथवा यज्ञ-विवाह ज॑से शुभ प्रसगो पर स्त्रियों को बाहर निकलने में किसी प्रकार की आपत्ति नही थी इस प्रकार स्त्रियों को उचित शिक्षा भी दी जाती थी और आवश्यक स्वतंत्रता भी उन्हे प्राप्त थी | वे ससार में हर प्रकार अपने पति की सहायिका रहती थी

हि.

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हम ऊपर यह देख चुके हे कि भारतवणे में स्त्रियां अविवाहित रह सकती थी कन्याओं का विवाह भी होता था, परन्तु इतनी कम उम्र में नही जितनी मे कि आजकल होता है | रूप, गृण और कुल में समान वर को ही कन्या दी जाती थी। बाल-विवाह और अनमेल विवाह तो हमारी अधोगति के जमाने में ही प्रचलित हुए हे। कन्या के रूग्न के सम्बन्ध मे मनु भगवान कहते हें---

जीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमायंतुमती सती।

ऊध्व तु कालादेतस्माद्विदेत सदर्श पतिम॒]। (मनु ९-९०)

अर्थात्‌--कन्या रजस्वलूा होने पर तीन वर्ष तक पति की खोज करती रहे और अपने योग्य पति को प्राप्त करे

इन्ही मनूजी ने यह भी कहा हैँ कि ऋतुमती कन्या भले ही जीवन भर घर मे कुमारी रहे परन्तु गुणहीन पुरुष से कदापि शादी करे।

सत्री-जाति का आदर करने के लिए मनुस्मृति मे ख़ास तौर पर उपदेश दिया गया है कहा हैं कि जहाँ स्त्रियो का आदर होता है वहाँ देवताओं का निवास होता है; जहाँ उनका निरादर होता हैं वहा सभी शुभ क्रियायें निष्फल होती हे पति-पत्नी को एक-दूसरे के साथ कंसा सम्बन्ध रखना चाहिए, यह बताने के लिए स्मृतिकार लिखते हे--जिस कुल में स्‍त्री पुरष से और पुरुष स्त्री से सदा प्रसन्न रहते हें उस कुल में भानन्द, कीति और लक्ष्मी निवास करती है और जहाँ उन दोनो में लड़ाई-झगड़ा या विरोध होता है वहाँ दुख और दारिद्र हमेशा बसते हे

प्राचीन काल के वेद्य भी आरोग्य की दृष्टि से बाल-विवाह का निषेध करते थे सुश्रुत मे लिखा है---. सोलह वर्ष से कम उम्र वाली स्त्री से पच्चीस वर्ष से कम उम्र वाला पुरुष यदि गर्भ-स्थापना करे तो गर्भ कोख में ही कप्ट पाता है--अर्थात्‌, गर्भ-पात हो जाता है।

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यदि कही उस गर्म मे संतानोत्पत्ति हुई भी तो वह दीर्घायूषी नही हो सकती यदि सयोग-वश बच्चा जीता बचा रहा तो वह दुबंह और नित्य रोगी बना रहता है इसलिए कम उम्र की स्त्री में कभी गर्भ- स्थापना नहीं करनी चाहिए ।” धन्वन्तरि जैसे आर्य-भूमि के जलवायु तथा देशवासियो की प्रकृति से सुपरिचित वेद्यराज का यह स्पष्ट अभिप्राय है। तथापि ईसवी सन्‌ १८९१ तक हमारे देश में विवाह-योग्य लड़की की आयुमर्यादा १० वर्ष की मानी जाती थी, और जब सन्‌ १८९१ मे यह कानून वना कि १२ वर्ष से कम वम्त्र वाली लड़की से कोई शादी करे तब लोगो ने उसका घोर विरोध किया था। अभी भी शारदा-विल पर कुछ अन्धविश्वासी लोगो को आपत्ति है जब डा० गौड ने घारा-सभा में एक इस आशय का कानूनी मसविदा पेश किया कि लड़की की विवाह- योग्य उम्र १४ वर्ष की समझी जाय, तव इसमे भी कितने ही बिह्ान्‌ सभासदो का मत था, कि पर-पुरुष को ज़रूर १४ साल से कम उम्र वाली लड़की के साथ सम्बन्ध करने के अपराध में सज़ा दी जानी चाहिए, परन्तु पति के लिए तो इतनी छूट देना ज़रूरी हैँ कि वह बारह वर्ष की उम्र वाली पत्नी के साथ भी सम्बन्ध कर सकता है, क्योकि अभीतक हिन्दुमो का अधिकांश हिस्सा इस बात को मानता हैं कि रजस्वला होते ही स्त्री को पति के पास रहना चाहिए बीसवी सदी की हालत को देखते हुए हम अनुमान कर सकते हें कि हमारे प्राचीनकालीन पूर्वंज इस विषय में कितने उन्नत ओर उचित विचार रखते थे | हमे यह मानना होगा कि प्राचीदकाल में आयें रूलनाये जो बड़े-बड़े वीरता के काम और अदभुत पराक्रम करती थी इसका कारण वाल-विवाह का अभाव ही था। उनमे बारू-विवाह प्रचलित होने के कारण उनके शरीर, अवयव और चुद्धि पूर्ण विकास को प्राप्त हो जाते थे आजकल की वारह-बारह वर्ष

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की गृडियों की सन्‍्तान क्या तो बलवान विदेशियों के साथ जूझेगी, और क्या देश का उद्धार करेगी ? देश के नेताओ को इसपर विचार करना चाहिए

बुद्ध भगवान का आविर्भाव होते ही देश में धर्म का एक नवीन आन्दोलन शुरू हुआ | सभी ससार को. दु.खरूप मानने लग गये ससार दु खमय है, जीवन क्षण-भगृर है, सुख-दु की भावनाये केवल मोह है, मनृष्य का मुख्य उद्देश्य तो निर्वाण अथवा मुक्ति ही है, इत्यादि भाव लोगो के दिल मे बंठ गये बौद्ध परित्राजको ने समाज में यही उपदेश दिया इस उपदेश के कारण लोग ससार को घृणा की दृष्टि से देखने लगे सासारिक कतंव्यो की ओर से लोगो का ध्यान हट गया

अनेको ने घर-ससार का त्याग किया, और लोग निर्वाण की खोज में जगलो और सघो में जाने लगे

इस आन्दोलन से स्त्री-जाति भी अछती रह सकी इस स्वाधी- नता के युग में अबलायें भी पुरुषो के समान निर्वाण-मार्ग पर अग्रसर होने लगी पहले-पहल तो बुद्ध भगवान्‌ भिक्षु-सघ में स्त्रियों को स्थान देने के लिए तैयार नही थे। परन्तु उनकी धात्री माता महाप्रजावती गौतमी के आग्रह तथा शिष्य आनन्द की सिफारिश से उन्होने स्त्री-जाति को भी सघ में स्थान देना मजूर कर लिया | नये जोश मे ऊँचे वर्ग से लेकर नीचे वर्ग तक की अनेक कुमारिकाये, सधवाये तथा विधवायें भिक्षुणी-सघ से शामिल हो गईं अनेक कुलटाये पद्चात्ताप से पवित्र हो पुण्यमय जीवन व्यतीत करने की प्रतिज्ञा करके सघ मे मिली इन स्त्रियो ने शुरू-शुरू मे उपदेश का काम बड़ो अच्छी तरह किया और अपने चरित्र मे उच्च गुणो का विकास कर समाज के सामने बडी अच्छी मि- साले पेश की स्थरू-संकोच के कारण इस रत्नमाला में केवछ ९१ बौद्ध

( १२ )

स्त्रियो के चरित्र ही दिये गये हे ।/ उनके अवलोकन से उन भिक्षूणियों के विचार और जीवन से परिचय होगा। परन्तु समय॑ बीत जाने पर प्रत्येक अच्छी ससस्‍्था मे कोई-न-कोई दोष उत्पन्न हो ही जाता है वही हाल इस भिक्षुणी-सघ का भी हुआ आचायें श्री आनन्दशकर ध्यूव लिखते हे-- “उच्च मनोवृत्तिवाली स्त्रियाँ ससार को छोडकर भिक्षुणियाँ बनी कि उनकी अनुपस्थिति के कारण ससारा अन्धकार-मय हो गया। सामान्य जन-समाज में अधम वृत्ति बहुत जल्दी प्रबल हो जाती है अत समाज से ऊँची आत्माओ के अछग होते ही विकार स्वतत्र हो गया जहाँ-तहाँ वेश्याये दिखाई देने रूग गईं। शनेःशने इस विकारमय वायू-मण्डल का असर भिक्षुणियो पर भी पडने छगा | इस समय देश में धन खूब था और व्या- पार भी धडाके से चल रहा था विकार समृद्धि के साथ-साथ रहता है तदनसार ईसवी सन्‌ के प्रारम्भकाल में रचे हुए वात्स्थायन के कामसूत्र में अनेक कलाओ में निपुण गणिकाओ के वर्णेन हमे मिलते हैं पर हमे यह नही मान लेना चाहिए कि सभी गणिकायें दुष्ट ही होती थी नारी-हुदय की उच्चता तो गणिकावस्था मे भी प्रकट हो ही जाती है।” (नारी-प्रतिष्ठा ) इसी कारण उच्च हृदयवाली उन गणिकाओ को भी इस रत्नमाला में स्थान देने में हमने सकोच नही किया है, जिन्होने उचित प्रसंग के भाते ही अपने पापमय जीवन को तिलाजलि देकर जीवन की सफल बनाना अपना कतेंव्य समझ लिया श्री ध्रूव की कल्पना है कि जिस प्रकार कितने ही आदमियो के मतानुसार फलित ज्योतिष बाबिलोन से भारत में आया है, उसी प्रकार शायद यह गणिकाओ की सख्या भी ग्रीस से यहाँ आईं होगी वात्स्यायन-कामसूत्र को देखने पर पता चलता हैँ कि गणिकाये, राज-पुत्रियाँ तथा महामात्य की लडकियाँ किसी विशेष शिक्षा

* देखो “भारत के स्त्री-रत्न,तीसरा भाग !! मूल्य १) रु०

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को प्राप्त करती थी कला-विषयक शिक्षा तो अनुमानतः अधिक सामान्य रही होगी क्योकि लिखा हैं कि--- “तथा पतिबियोगे चर व्यसन दारुणं गता। देशान्तरे.४रप विद्यामिः सा सुखेनेव जीवति ॥” इस तरह कला को मुसीबत के समय में आजीविका का साधन भी बताया हैं | हाँ, इतना ज़रूर हमे ध्यान मे रखना चाहिए कि करा का विकास तो जरूर हुआ, परन्तु जैसा कि हम उसके विषय में महाभारत के समय में पढते थे कि कृष्णा और विदुर के समान ही कुन्ती नीतिशास्त्र में प्रमाणभृत थी, सो बात अब नही रही वात्स्यायन-कामसूत्र के तीसरे खण्ड के पहले अध्याय में लिखा हैं, कि एक गृहिणी के लिए ये कलाये जानना जरूरी है--(१) उद्यान- कला---पुष्प-शय्या बनाना, साग-तरकारी तथा गृह-देवता की पूजा के लिए फूल तैयार हो सके इस तरह की छोटी-छोटी क्यारियाँ बनाना और उनका सीचना (२) पाक-शास्त्र (३) दही बिलोकर घी और मक्खन निकालना आचार और मुरब्बे बनाना (४) नौकरो को तनख्वाहे देना तथा घर-ख़र्च का हिसाब रखना आय के अनुसार ही व्यय हो इसके लिए वाधिक हिसाब करना (५) पालतू पशु-पक्षियो की रक्षा करना (६) पुराने चिथडो की गुदड़ी आदि बनाना ( ७) रस्सियाँ तथा किनारे गूंधना और (८) सबसे आवश्यक्र बात है चरखे पर सूत कात कर उसे अपने घर पर ही बुन लेना हमारे सौभाग्य से महात्मा गाँधी द्वारा इस प्राचीन कला का पुनरुद्धार हो रहा है और यह भी आशा बँध रही हैँ कि इसे स्त्री-शिक्षा मे उचित स्थान दिया जायगा। उस समय उच्च घरो की स्त्रियों को सगीत, नृत्य, वाद्य और चित्रकला की शिक्षा भी दी जाती थी, यह इस रत्ममाला के अनेक चरित्रो से पाठकों को

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भली-भाँति ज्ञात हो जायगा शरीर को नीरोग और मज़बूत बनाने के लिए वात्स्यायन मुनि ने स्त्रियो से व्यायाम की सिफारिश भी एक पृथक्‌ प्रकरण में की है जिसे व्यायामिकी विद्या' कहा है (प्रो० भवानीभूतति विद्याभूषण एम० ए० का कलकत्ता की ओरियेण्टल कान्‍्फेन्स में पढ़ा हुआ निवन्ध देखिए ।)

इस ग्रन्थ में महाभारत के समय के अनेक स्त्री-रत्नो के चरित्र लिखे गये है उनके चरित्रों की समालोचना करते हुए रा० ब० चिन्तामणि विनायक वैद्य एम० ए० एल-एल० बी० अपने महाभारत की समा- लोचना' नामक ग्रन्थ में लिखते है --

“महाभारत के स्त्री-पात्र इलियड के स्त्री-पात्रों की अपेक्षा बढ- कर हैं हेलन और ऐड्रोमिश भी द्रौपरी की तुलना में खडी नही रह सकती द्रोपदी का स्वभाव-चित्रण करते हुए महाभारतकार ने हमे स्त्री- स्वभाव की उस उच्चता का दर्शन कराया है, जिसका वर्णन करने के लिए हमें शब्द ढूँढें नही मिलते द्रोपदी एक साध्वी है वह अपने आत्मगौरव के खयाल को कभी भूलती ही नहीं। कठिन-से-कठिन विपत्तियों मे भी वह धीरज नहीं छोडती वह इतनी पवित्र-और निर्मल है कि मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता पर फिर भी वह मानृषी है। कई बार चर्चा करते समय उसमें स्तद्री-सहज विकार और सत्याग्रह भी पाया जाता है कई बार वह हठ भी करती है, जिसे उसके पतियों को पूरा करना पडता है | पर फिर भी वह स्त्री असाधारण थी हेवटर जिस प्रकार अपनी स्त्री को केवल घर-गृहस्थी के कामो के योग्य समझता है, उस प्रकार इसे तुच्छ कदापि नही कहा जा सकता यह एक राज- पूतनी हैं राजपूत का शौयें और मनोवल इसके चेहरे पर चमकता हें अरे ! कीचक गौर जयद्रथ जैसे नराधम जब इसे पकड कर इसपर

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बलात्कार करने का प्रयत्न करते है, तब यह उन्हे एक आदर्श राजपूतनी की नाईं ऐसे ज्ञोर से धक्का लगाती है कि वे जमीन पर गिर पडते हे इसका प्रसगावधान भी ऐसा है कि यदि पुरुषों के पास वैसा प्रसगावधान जाय तो उसपर वे फूले समायें | इसे जब कहा गया कि “जूआ खेलते समय तू बाजी में हारी गई है ।! तब इसने एक ऐसा सवाल किया कि दुर्योधन के तमाम दरबारी भौचक्के-से रह गये इसका वह उदार सकल्‍प अप्रतिम था, जब स्वयवर के समय यह गरीब ब्राह्मण का वेश धारण करनेवाले अर्जुन को प्राप्त हुई और इसने अर्जुन को सुख-दु'ख का साथी बनाने का निश्चय किया दीर्घकाल के वनवास मे पाण्डवों के साथ रहने की इसकी तत्परता और इसका असीम धीरज हमेशा हिंदू स्त्रियों के अन्त.करण मे संतोषपूर्वक एवं भक्तिपू्वंक पति के साथ रहने की प्रेरणा करते आये हे

“महाभारत का दूसरा प्रतापशाली स््री-पात्र कुन्ती है। पाण्डव अपनी स्त्री को लेकर बारह वर्ष के लिए वनवास को जाते हे उस समय, माता कुन्ती विदुर के घर रहने लगी तथापि वहाँ रहते हुए भी वह कृष्ण के मुख से अपने पुत्रो को जो सन्देश कहलाती है, वह सचमुच एक वीर क्षत्राणी को शोभा देने योग्य है। वह युद्ध करने के लिए प्रबल उत्साह उत्पन्न करनेवाला है। वह अपने पुत्रो से कहती है --विजय प्राप्त करो या मर मिटो !” इस तरह वह अपने लड़को को युद्ध के लिए उत्तेजित करती है, परन्तु अपने स्वार्थ के लिए नही | जब पाण्डवो को राज्य मिल जाता है, वे सिंहासन पर बैठ जाते हे, तब कुन्तो उन्हे छोड़कर धृतराष्ट्र के साथ वन को चली जाती हे और उस बूढे अन्धे की सेवा करते-करते अपनी जीवन-यात्रा को समाप्त कर देती है.। जब वह जाने लगी तब भीम ने माता की खूब प्रार्थना की और कहा---'माँ, तुम

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हमारे साथ रहो, तुम्हारी शिक्षा के अनुसार चलकर हमे जो कुछ मिला उसका उपभोग तुम भी हमारे साथ में रहकर करो पर 'माता कुन्ती ने साफ कह दिया, “मेने अपने पति के जमाने में सभी भोग भोग लिये। अब मुझे भोगने की इच्छा नही रही युद्ध के लिए तो मेने तुम्हे इसलिए उत्तेजित किया, कि में तुम्हे भीख माँगकर पेट भरने देना पसन्द नही करती थी विदा होते समय उसने जो शब्द कहे वे सुवर्णाक्षरों में लिखने योग्य हे उसने कहा, “अपनी मति को हमेशा धर्म की तरफ रक्‍खो और वृद्धि को उदार ।/ यह एक पक्ति समस्त महाभारत का निचोड है ।”

घूंघट और परदे के विषय मे श्री आनदशकर ध्यूव लिखते हे---“यह मानने के लिए हमारे पास अनेक कारण है कि वेदकाल में तथा उसके बाद भी घूधट और परदे का रिवाज नही था | परन्तु मालूम होता है कि कालिदास के समय मे कुछ-कुछ था। साधारणत*' परदे की तमाम ज़िम्मेदारी मुसलमानो पर ही रक्‍्खी जाती हैं। परन्तु हमे तो मालूम होता है कि कालिदास के समय में भी वह कुछ-कुछ विद्यमान था | 'शुद्धान्त”' और “अवरोध' ये दो शब्द इस विषय के काफी प्रमाण हे इन शब्दों के पढने पर हम यह नही कह सकते कि पहले परदा ज़रा भी नही था हाँ, यह हो सकता हैं कि उस समय परदे का रिवाज सारी प्रजा मे रहा हो आज भी जिस प्रकार विदेशी रीति-रिवाजो का असर विशेषकर ऊपर के वर्ग के लोगो पर ही होता है, उसी प्रकार मेरा खयाल हैं कि कालिदास के समय में भी ग्रीस देश के रिवाजो का प्रभाव राजा और राजा के समान छनिको के यहाँ सबसे पहले पडा होगा। ग्रीस में जिस प्रकार कुलागनायें छत से नोचे नही उतरती थी उसी प्रकार शायद भारत में भी कालिदास के समय में छोगो में मान्यता फछ गई

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होगी कि राजा की रानियों को जनाने में ही रहना चाहिए जार में. स्‍त्री के उपयोग के विषय में कालिदास की भावना बड़ी ऊंची थी

ग्ृहिणी सचिदः सखा प्रियशिष्या ललिते कलाविधों

करुणा-विम्लुखेन झत्युना हरता त्दा चद्‌ कि मे हृतम्‌॥

इन्दुमति ! विद्वानों का कथन है कि गृहधर्मो का सम्पूर्ण अनु- सरण करनेवाली धर्मंपत्नी ससार के जटिल प्रशनो को हल करते समय उत्तम सलाह देनेवाली मत्री-रूप है, विनोद के समय प्रीति-पात्र मिन्र- रूप है, और सगीतादि कलाओ का अनुशीलन करते समय स्नेह-पात्र शिष्या के समान है इस कथन के अनुसार, हे प्रिये ! अनेक सम्बन्धो के आधाररूप तुझे हरण कर उस कराल काल ने मुझसे क्या-क्या नही छीन लिया ? अर्थात्‌, सब कुछ-छीन लिया

इसी प्रकार उत्तर-रामचरित्र में भवभूति ने कहा है.

अद्देतं खुखढुखश्योरञ्ञगु्णं सर्वास्ववस्थाखुयद्‌ विश्रामो हृदयस्थ यत्र ज़रसा यस्मिनन्‍्नहायों रसः स्वधर्म-सम्पन्न दाम्पत्य-प्रेम सुख और दुख में एक-सा होता हैं जो सभी अवरथाओ में हृदय का विश्रम-स्थान है, वृद्धावस्था मे भी उसका रस अक्षय होता है

प्राचीन ऋषियों के हृदय में दाम्पत्य सुख की जो परमभावना प्रतीत होती थी, उसे इस इलोक ने हमारे सामने उपस्थित कर दिया है। इसके उदार हृदय से निकलनेवाने उद्गार--गुणाः पूजास्थानं शुणिष्रु लिंग वय/--तो डाक्टर भाडारकर की बनाई पुस्तके पढनेवाले प्रत्येक विद्यार्थी की जबान पर पहुँच गये हे परन्तु बहुतो को शायद यह मालूम होगा कि राजशेखर कवि की (नवी सदी की ) “विव्दशाल मत्रिका' नामक नाटिका में मृगाकावलि कदुक--गेद--..-

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खेलती है यह खेल हमारे देश मे बहुत प्राचीन था नवशिक्षित स्त्रियो को बेडमिण्टन खेलते हुए देखकर आग-बबूला होनेवाले टीकाकारो को ज़रा अपने प्राचीन साहित्य को भी देख जाना चाहिए ।”

आचायें श्री आनदहकर ध्यू व, ग्वालियर के भूतपूर्व न्यायमूर्ति रा० ब० चिन्तामणि वंद्य, श्री नारायणचन्द्र वन्योपाध्याय एम० ए० आदि के लेखो के अधार पर ( वेदकाल से लेकर बौद्धयुग तथा सस्क्ृत नाटकों के काल तक ) हमने आये स्त्रियों के जीवन का अवलोकन किया इस- पर से पाठको को ज्ञात होगा कि हमे अपनी इन पूर्वजाओ के लिए अभिमान होना चाहिए केवल पातित्नत में ही नही बल्कि वीरता, शौर्य, स्वदेश अथवा स्वजाति के अभिमान, दया, परोपकार, स्वार्थेत्याग, विद्त्ता, चातुर्य आदि अनेक गृणो में भारतीय आयें महिला अन्य किसी भी देश की अपनी बहनो से किसी प्रकार कम नही थी। इन आर्य माताओ के चरित्रो को केवल स्त्रियाँ ही नही बल्कि पुरुष और,खास कर नवयुवकष भी इस गरज से पढें कि अपनी माताओ की महिमा जान ले

साधारणतया मेने ऐसे कई पुरुषो को देखा हूँ जो ऐसे ग्रन्थों को स्त्नी- उपयोगी समझकर स्त्रियो के सुपुर्द करके निश्चिन्त हो जाते हे, स्वय कभी नही पढते इसलिए नम्रतापूर्वक प्रार्थना करना चाहता हूँ कि केवल सत्री-समाज ही नही, बल्कि पुरुषवर्ग भी यदि इन ग्रन्थों में वणित चरित्रो को पढने का कष्ट उठावेगा तो में अपने इस प्रयास को सफल समझूंगा |

शिवप्रसाद दलपतराय परिडत

भारत के ख्ी-रत्न

| पहला भाग ]

बेदिक काल

दक्ष-कच्या

सती

रिह्वार में जिस स्थान पर गड्ढम नदी हिमालय सभूमि पर हे अवनीण हुई है. उसके सामने के मैदान को कनखल कहते >। ज्षिस समय का मिक्र हे, उस समय दक्ष प्रज्ञापति इस प्रदेश का खज़ाथा। गजा उन्ष का प्रताप खूब बटा-चढ़ा था एऐश्वर्य एवं पराक्रम में इसया मुकाबला करनेवाढा उस रामय कोई था यही नहीं किन्तु सह महानपस्थी भी था। उसने कितने यज्ञ, कितने दान, कितने व्रत ओर अनुष्ठान किए, इसकी तो कोई गिनती ही नहीं। इसीलिए सर्व- साधारण कांग करते थे कि धर्म ओर कर्म मे राजा दक्ष के साथ ओर किलीफी तुछता नहीं हो सकती

भारत के स्त्री-रत्न ८4

ना

यहां तक कि नदी को सतह में क्रीड़ा करनेवाी छोटी-छोटी मछलियाँ भी उसमें स्पष्ट देखी जा सकती है। किसी जगह जछ पारे-जैसा सफेद है, तो किसी जगह मेघ के समान शुश्र | आँखों को तो उसे देखने से ही ठण्डक पहुँच जाती है।

गद्जा का जो स्लोत कमखलछ के आगे होकर बहता है, उसका नाम नील्धारा है मिणि-मुक्ताओं से जटित राजा दक्ष का महक इस नीलधारा के तट पर ही था। वर्षा क्रूतु में नदी का स्रोत इस महल को धोता हुआ बहता था ओर महल में रहनेवाले छोग उस प्रवाह से रात- दिन होनेवाले कछकल-नाद का अवण करते हुए निद्रा-मग्न होते थे

राजा दक्ष के अनेक पुत्रियाँ थीं। जिस प्रकार सरोवर खिले हुए कमलों से ओर आकाश ज्योतिर्मय तारों से सुशोभित रहता है, राजा दक्ष का राजभवन भी राजकुमारियों के अपूर्व-सोन्दर्य से वैसा ही सुशोभित रहता था। राजमहिषी को कन्याओं के मनोमोहक रूप देख-देखकर इतना आनन्द होता जिसका कुछ ठिकाना नहीं |

राजकुमारियाँ प्रति दिन नीलूधारा में स्नान करने जातीं | नदी के स्रिग्य जल मे ज्लान करके वे जलक्रीड़ा करतीं। नदी के किनारे की रेत में वे दोड़ छृगातीं ओर नदी के प्रवाह मे से रंग-बिरंगे छोटे- छोटे पत्थर इकट्ठें करके घर छातीं माता उन्हें देख कर हँसती ओर कहती--“अपने घर से अनेक मणिमुक्तादि रत्र भरे पढ़े है, उन्हें छोड़ इन पत्थरों को तुम क्यों इकट्ठा करती हो ९” ;

राजकुमारियाँ कुछ जवाब तो देती, पर मणि-मुक्तिओं की डपेक्षा करके इन पत्थरों से ही अपने खछ के घर सजातीं

धीरे-धीरे राजकुमारियाँ बड़ी हुईं। खूब समारोह के साथ प्रजापति दक्ष ने उनके विवाह कर दिये मनचाहे समधी ओर जेबाइयों के

पर

है]

मिलने से राजा-रानी के आनन्द की सीमा रहोग विवाह के बाद, एक-एक करके, राजकुमारियाँ अपनी-अपनी ससुराल गई ओर आनन्दपूर्वंक अपने घर-बार सम्हालने में छगीं

परन्तु दक्ष की एक कन्या अभी तक कुंवारी थी। इसका नाम सती था| सती सब कन्याओं से छोटी होने के कारण, माता-पिता का उसपर सबसे अधिक स्नेह था राज्ञा-रानी की इच्छा थी कि सती सयानी हो जाय तब दूसरी सब कन्याओं से ज्यादा ठाटबाट से ओर अच्छे घर के साथ उसका विवाह करें |

सती के रूप-गुण का तो कहना ही क्या वैसे तो राजा दक्ष की सभी कन्यायें अनुपम सुन्दरियाँ थीं; १रन्‍्तु सती के साथ तो किसी का मुक़ाबला नहीं हो सकता था। सती का सोन्दर्य उसके शरीर के वर्ण अथवा उसकी आँख या कानों की बनावट में था। उसका सोन्दर्य तो था उसके भाव में, उसके शरीर की दिव्य ज्योति में जिस किसी की भी उसपर नज़र पड़ जाती; एकटक उसे देखता ही रह जाता। साधु-संल्यासियों को तो उस बालिका को देखकर जगत-जननी के स्वरूप का भान होने छगता ओर भक्ति के साथ वे उसे प्रणाम करने लगते थे

सती का स्वभाव भी अन्य राजकुमारियों से बिलकुल भिन्न था। ओर राजकुमारियाँ तो वस्थाभूषण ओर खाने-पीने में मगन रहतों, पर सती का इस ओर ज़रा भी ध्यान था। राजकुमारियों में से कोई तो इन्द्र-धनुष के रंग की साड़ियाँ पसन्द करतीं; कोई कमलपत्रों से बनाये गये वस्तों से शरीर को अलंकृत करती; पर सती की रुचि ओर ही तरह की थी। उसे गेरुआ रह्ढः पसन्द था। ओर कन्याओं के गलों में जहाँ मोती की माछाय॑ और हाथों में हीरे के कज्गण

आरत के स्त्री-रत्न दि

सुशोमित रहते वहाँ सती के गले-मे स्फटिक की सफ़ेद माला रहती ओर कोमल हाथों में रुद्माश्ष॒ के दाने ओर राजकुमारियाँ जहाँ अपने शरगीरों पर चन्दन ओर कस्तूरी का लेप करतो, वहाँ सती के छलाट में पिता के यज्नकुण्ड की भस्म शोभा पाती | सेविकाये साव- घानी से वाल गँथतीं, पर सती कुछ ही देर में उन्ह॑ विखेर डालती ओर जटा को तरह बाँध लेती। किशोर ओर कुंवारी कन्या की शरीर के अलंकारों के प्रति ऐसी छापर्वाही देखकर भरा किस माता के इृंढय को दुःख होगा ? अदः रानी को अपनी छाड़छी वेटी की ऐसी दशा देखकर दुःख होना स्वाभाविक ही था | कभी-कभी तो छुछ खिन्न होकर वह सती से कइ भी वैठती--“सती | तू दिनोंदिन बड़ी होती जाती है, पर तुके कुछ शऊर क्यों नहीं आता तो ढंग से कपड़े पहनती है, अच्छे-अच्छे आभूषण पहनती है, ओर दासियों से जूडा ही वँधवाती है तमाम दिन वार बिखेरे फिरती है इतनी चड़ी लड़की ऐसे आचरण करें तो छोग उसे पागल कहते है | ऐसी लड़की से कोई विवाह भी नहीं करता | भला; तू कब तक ऐसी नादान रहेगी ९”?

माता की ऐसी बाते सुनकर सती हँस पड़ती ओर कहती--“कोई विवाह नहीं करेगा तो अच्छा ही है, में तुम्हारे ही पास रह जाऊंगी।”

माता को तो वह ऐसा जवाब दे देती, पर वाद मे उसके मन में दाना प्रकार के विचार उठने | छेकिन वह कहती, कि वस्लाभूपण ओर जूड़े की शोभा देखकर ही जो मेरे विषय मे अपने विचार वनावेगा उराके साथ तो म॑ हर्गिज अपना विवाह नहीं करूंगी

राजा उल्ष ने जब सनी की यह हालत देखी. तो उन्हें भी बड़ी

तु सती सरल ओर आनन्दमयी देवी थी. इससे

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राजा दक्ष को उससे कुछ कद्दने का साहस हुआ संवी में एक दोप ओर था | वह यह कि उसका स्वभाव बड़ा भावुक था | उसे कोई ज़रा भी कुछ कहता, तो उसकी कमछ-जेसी आंखों में आँसू भर आते। दक्ष जब उसकी ऐसी दशा देखता तो रानी से कद्ता--“जाने भी ढो, हमारो बेटी तो पागछ है। अच्छा हो, कि भगवान किसी पागल के साथ इसका पछ्का बाँध ।”

होते-होते सती विचाह-योग्य हो गई | तब उसके छिए वर तलाश करने को राजा दक्ष ने अपने भाई देवर्पि नारद को बुछाया। राजा ने उत्तस कहा--“नारद ! तुम वहुत घृमते रहते हो। ग्ररीव-अमीर, भृहस्थी-संस्यासी, सब छोगों में तुम्हारी पठ है अपने मित्रों की सहायता से, सती के छिए, अगर तुम कोइ योग्य वर हूँढ छाओ नो बड़ा अच्छा हो ।”

“अच्छा” कहकर नारदजी वर ढूँढन चढछ दिये बहुत कुछ खोज के बाद, वह फिर कनखछ आये राज-रानी से उन्होंने कहा-- “तुम्हारी सती के लिए मंने बहुत योग्य वर तलाश कर ढिया है सती के लिए, उससे अधिक योग्य बर मुझे ओर कोई नहीं मिछा ।”

दक्ष ने उत्काठा से पृछा--“वह फोन है १” तब नारद ने जवाब द्विया--“केलासपति शद्गूर ।”

तारद का यह कहना था कि राजा दक्ष का सिर चढ़ गया। पर बह कुछ कहे. इससे पहले हो रासी चोछ उटठी--“कैंडास नगरी ? वह तो चहुन दूर है। रास्ता भो बड़ा विकेट ह! सती को अगर इननों दूर ब्याह देंगे. नो जब चाहेगे उससे मिल नहीं सकेंगे ओर सन्‌ हाल-चाल ही मास्म कर सकेंगे ।"

तारद में बदा--“रानी तुम्दे कमी किस बात की है. जो इच्छा

भारत के स्त्री-रतन

होने पर भी, केवल दूर होने के कारण, तुम सती से मिल सको गाड़ी, घोड़ा, रथ, हाथी, विमान--जो कुछ चाहिए वह सब तो तुम्हारी सेवा में हाजिर है; फिर फ़जूल बहाना करने से क्या छाभ फिर यह भी तो सोचो कि तुम हमेशा अपनी कन्या'से मिलती रहो, यह ठोक, या उसे अच्छा वर मिले, यह ठीक तुम्हारी सती को सुख मिलना चाहिए, फिर अगर तुम उससे भी मिल सको तो क्या हुआ है ? माँ-धाप को तो इसी बात मे सन्तुष्ट रहना चाहिए कि उनकी पुत्री सुखी रहे ।”

नारदजी की यह बात राज-रानी दोनों को पसन्द आई। दक्ष बोले--“यह तो ठीक पर वर की विद्या-वुद्धि केसी है ९”

नारद ने कहा --“विद्यो-बुद्धि में तो उनकी बराबरी करनेवाला आज ओर कोई नही है। वेद, पुराण, तंत्र आदि कोई भी शास्त्र या विद्या ऐसी नही जिसमें वह प्रवीण हों उनकी बुद्धि कितनी तीत्र है, इसका अनुमान तुम इसीपर से छगा सकते हो कि स्वयं वशिष्ठ मुनि ने उनसे कऋूक्‌; यज्ञु तथा सामवेद का अध्ययन किया है, परशुराम ने धनुर्विया सीखी है, ओर मेंने गान-विद्या का अभ्यास किया है ।”

नारदजी की ये वाते सुनकर दक्ष का चेहरा खिल उठा उसने कहा--“वर का वल-बीर्य केसा है ९”

नारढ--“वलछ का परिचय तो उनके धन्ुप से ही मिल सकता है। उसकी डोरी चढाना तो दूर, दूसरा कोई तो उसे हिला-डुछा भी नहीं सकता इस धनुप से निकले हुए बाण से ही त्रिपुरासुर राक्षस को मृत्यु हुई थी

रानी ने पूछा--“डइनका झूप-रंग कैसा है ?”

रे

नारद--“उनके रूप-रंग का ता पूछना ही व॒लच्चा८ हष्ट-पुष्ट लम्बा चोडा शरीर है,